Chapter 9
Raja Vidya Yoga
राजविद्याराजगुह्ययोग
Rāja Vidyā Yog
Chapter Summary· अध्याय सारांश
In this chapter, Krishna explains that the deepest spiritual truth is simple: God is present everywhere, yet people often fail to notice Him. He says that devotion, trust, and a sincere heart matter more than outward rituals alone. Krishna also describes how He supports the whole world, enters every being, and still remains beyond all things. The chapter teaches that even a small offering made with love, like a leaf, a flower, or water, is accepted by God. It ends by showing that anyone, from any background, can reach Him through steady devotion and a pure mind.
इस अध्याय में कृष्ण बताते हैं कि सबसे गहरी आध्यात्मिक सच्चाई बहुत सरल है: भगवान हर जगह हैं, लेकिन लोग उन्हें अक्सर पहचान नहीं पाते। वे कहते हैं कि केवल बाहरी कर्मकांड से ज्यादा जरूरी श्रद्धा, विश्वास और सच्चा मन है। कृष्ण यह भी समझाते हैं कि वे पूरे संसार को संभालते हैं, हर प्राणी के भीतर रहते हैं, और फिर भी सब कुछ से परे हैं। यह अध्याय सिखाता है कि प्रेम से दिया गया छोटा-सा अर्पण, जैसे पत्ता, फूल या जल, भी भगवान स्वीकार करते हैं। अंत में यह बताया गया है कि किसी भी पृष्ठभूमि का व्यक्ति, यदि वह स्थिर भक्ति और शुद्ध मन रखे, तो भगवान तक पहुँच सकता है।
All 35 Verses· सभी श्लोक
- 9.1श्रीभगवानुवाच |
- 9.2राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् |
- 9.3अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप |
- 9.4मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना |
- 9.5न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् |
- 9.6यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् |
- 9.7सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् |
- 9.8प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः |
- 9.9न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय |
- 9.10मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् |
- 9.11अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् |
- 9.12मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः |
- 9.13महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः |
- 9.14सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः |
- 9.15ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते |
- 9.16अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् |
- 9.17पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः |
- 9.18गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् |
- 9.19तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च |
- 9.20त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
- 9.21ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
- 9.22अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते |
- 9.23येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः |
- 9.24अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च |
- 9.25यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः |
- 9.26पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति |
- 9.27यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् |
- 9.28शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः |
- 9.29समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः |
- 9.30अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् |
- 9.31क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति |
- 9.32मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः |
- 9.33किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा |
- 9.34मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
- 9.35ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
FAQ· सामान्य प्रश्न
How many verses are in Bhagavad Gita Chapter 9?
Chapter 9 (Raja Vidya Yoga) of the Bhagavad Gita has 34 verses.
What is Bhagavad Gita Chapter 9 about?
In this chapter, Krishna explains that the deepest spiritual truth is simple: God is present everywhere, yet people often fail to notice Him. He says that devotion, trust, and a sincere heart matter more than outward rituals alone. Krishna also describes how He supports the whole world, enters every being, and still remains beyond all things. The chapter teaches that even a small offering made with love, like a leaf, a flower, or water, is accepted by God. It ends by showing that anyone, from any background, can reach Him through steady devotion and a pure mind.