Chapter 3

Karma Yoga

कर्मयोग

Karm Yog

Chapter Summary· अध्याय सारांश

In this chapter, Krishna explains that a person should not run away from work, but should do the right duty with a calm mind. He says that action is necessary in life, and even great people set an example by working for the good of others. The chapter teaches that when we do our duty without selfish desire, our mind becomes clearer and life becomes more balanced. It also shows that controlling the senses and acting with discipline helps a person grow inwardly. In simple words, this chapter teaches how to live and work well without becoming trapped by the results.

इस अध्याय में श्रीकृष्ण समझाते हैं कि मनुष्य को काम से भागना नहीं चाहिए, बल्कि शांत मन से अपना सही कर्तव्य करना चाहिए। वे कहते हैं कि जीवन में कर्म जरूरी है, और बड़े लोग भी दूसरों के भले के लिए काम करके उदाहरण बनते हैं। यह अध्याय सिखाता है कि जब हम बिना स्वार्थ और बिना फल की चिंता के अपना काम करते हैं, तो मन साफ और जीवन संतुलित होता है। यह भी बताया गया है कि इंद्रियों पर संयम और अनुशासन रखने से मनुष्य भीतर से मजबूत बनता है। सरल शब्दों में, यह अध्याय सिखाता है कि परिणाम में उलझे बिना कैसे सही ढंग से जीना और काम करना चाहिए।

All 44 Verses· सभी श्लोक

  1. 3.1अर्जुन उवाच |
  2. 3.2व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे |
  3. 3.3श्रीभगवानुवाच |
  4. 3.4न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते |
  5. 3.5न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् |
  6. 3.6कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् |
  7. 3.7यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन |
  8. 3.8नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः |
  9. 3.9यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः |
  10. 3.10सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः |
  11. 3.11देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः |
  12. 3.12इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः |
  13. 3.13यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः |
  14. 3.14अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः |
  15. 3.15कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् |
  16. 3.16एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः |
  17. 3.17यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः |
  18. 3.18नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन |
  19. 3.19तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर |
  20. 3.20कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः |
  21. 3.21यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः |
  22. 3.22न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन |
  23. 3.23यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः |
  24. 3.24उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् |
  25. 3.25सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
  26. 3.26न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् |
  27. 3.27प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः |
  28. 3.28तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः |
  29. 3.29प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु |
  30. 3.30मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा |
  31. 3.31ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः |
  32. 3.32ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् |
  33. 3.33सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि |
  34. 3.34इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ |
  35. 3.35श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
  36. 3.36अर्जुन उवाच |
  37. 3.37श्रीभगवानुवाच |
  38. 3.38धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च |
  39. 3.39आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा |
  40. 3.40इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते |
  41. 3.41तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ |
  42. 3.42इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः |
  43. 3.43एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना |
  44. 3.44ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु

FAQ· सामान्य प्रश्न

How many verses are in Bhagavad Gita Chapter 3?

Chapter 3 (Karma Yoga) of the Bhagavad Gita has 43 verses.

What is Bhagavad Gita Chapter 3 about?

In this chapter, Krishna explains that a person should not run away from work, but should do the right duty with a calm mind. He says that action is necessary in life, and even great people set an example by working for the good of others. The chapter teaches that when we do our duty without selfish desire, our mind becomes clearer and life becomes more balanced. It also shows that controlling the senses and acting with discipline helps a person grow inwardly. In simple words, this chapter teaches how to live and work well without becoming trapped by the results.