Chapter 4

Jnana Karma Sanyasa Yoga

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Jñāna Karm Sanyās Yog

Chapter Summary· अध्याय सारांश

In this chapter, Krishna explains that the wisdom of this path has been passed down through a long line of teachers, and Arjuna is being told that this knowledge is ancient and important. He shows that God appears in the world again and again to protect goodness and guide people back to the right path. Krishna also explains that a person should work without selfish desire, because such action does not bind the soul. The chapter teaches that real understanding comes when a person sees action, knowledge, and devotion as parts of one higher truth.

इस अध्याय में श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह ज्ञान बहुत पुराने समय से गुरु-परंपरा के माध्यम से चला आ रहा है, और अर्जुन को यह गहरी बात समझाई जाती है। वे कहते हैं कि जब-जब संसार में धर्म कमजोर होता है, तब-तब ईश्वर सही मार्ग दिखाने के लिए आते हैं। श्रीकृष्ण यह भी समझाते हैं कि मनुष्य को बिना स्वार्थ के कर्म करना चाहिए, क्योंकि ऐसा कर्म बंधन नहीं बनाता। यह अध्याय सिखाता है कि सच्ची समझ तब आती है जब कर्म, ज्ञान और भक्ति को एक ही ऊँचे सत्य के रूप में देखा जाए।

All 43 Verses· सभी श्लोक

  1. 4.1श्रीभगवानुवाच |
  2. 4.2एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः |
  3. 4.3स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः |
  4. 4.4अर्जुन उवाच |
  5. 4.5श्रीभगवानुवाच |
  6. 4.6अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् |
  7. 4.7यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
  8. 4.8परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
  9. 4.9जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः |
  10. 4.10वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः |
  11. 4.11ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
  12. 4.12काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः |
  13. 4.13चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः |
  14. 4.14न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा |
  15. 4.15एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः |
  16. 4.16किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः |
  17. 4.17कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः |
  18. 4.18कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः |
  19. 4.19यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः |
  20. 4.20त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः |
  21. 4.21निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः |
  22. 4.22यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः |
  23. 4.23गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः |
  24. 4.24ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् |
  25. 4.25दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते |
  26. 4.26श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति |
  27. 4.27सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे |
  28. 4.28द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे |
  29. 4.29अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे |
  30. 4.30अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति |
  31. 4.31यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् |
  32. 4.32एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे |
  33. 4.33श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप |
  34. 4.34तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया |
  35. 4.35यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव |
  36. 4.36अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः |
  37. 4.37यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन |
  38. 4.38न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते |
  39. 4.39श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः |
  40. 4.40अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति |
  41. 4.41योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् |
  42. 4.42तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः |
  43. 4.43ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु

FAQ· सामान्य प्रश्न

How many verses are in Bhagavad Gita Chapter 4?

Chapter 4 (Jnana Karma Sanyasa Yoga) of the Bhagavad Gita has 42 verses.

What is Bhagavad Gita Chapter 4 about?

In this chapter, Krishna explains that the wisdom of this path has been passed down through a long line of teachers, and Arjuna is being told that this knowledge is ancient and important. He shows that God appears in the world again and again to protect goodness and guide people back to the right path. Krishna also explains that a person should work without selfish desire, because such action does not bind the soul. The chapter teaches that real understanding comes when a person sees action, knowledge, and devotion as parts of one higher truth.