Chapter 6
Dhyana Yoga
ध्यानयोग
Dhyān Yog
Chapter Summary· अध्याय सारांश
This chapter explains how a person can train the mind to become calm, focused, and free from inner disturbance. It says that real progress comes when we control our habits, live with balance, and keep the mind from running after too many desires. The chapter also describes meditation as sitting quietly, focusing the mind, and slowly building a deep inner connection with the Divine. It teaches that even if the mind wanders, one should patiently bring it back again and again, because steady practice leads to peace.
इस अध्याय में बताया गया है कि मन को शांत, एकाग्र और भीतर से मजबूत कैसे बनाया जाए। इसमें कहा गया है कि सच्ची उन्नति तब होती है जब हम अपनी आदतों पर नियंत्रण रखें, जीवन में संतुलन बनाए रखें, और मन को अनावश्यक इच्छाओं के पीछे भागने से रोकें। अध्याय ध्यान (मन को एक जगह टिकाने की साधना) का तरीका भी समझाता है, जिसमें शांत बैठकर धीरे-धीरे भीतर की दिव्य अनुभूति से जुड़ना होता है। यह भी सिखाया गया है कि मन भटक जाए तो निराश न होकर उसे बार-बार वापस लाना चाहिए, क्योंकि नियमित अभ्यास से ही शांति मिलती है।
All 48 Verses· सभी श्लोक
- 6.1श्रीभगवानुवाच |
- 6.2यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव |
- 6.3आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते |
- 6.4यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते |
- 6.5उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् |
- 6.6बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः |
- 6.7जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः |
- 6.8ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः |
- 6.9सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु |
- 6.10योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः |
- 6.11शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः |
- 6.12तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः |
- 6.13समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः |
- 6.14प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः |
- 6.15युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः |
- 6.16नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः |
- 6.17युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु |
- 6.18यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते |
- 6.19यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता |
- 6.20यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया |
- 6.21सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् |
- 6.22यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः |
- 6.23तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् |
- 6.24सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः |
- 6.25शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया |
- 6.26यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् |
- 6.27प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् |
- 6.28युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः |
- 6.29सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि |
- 6.30यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
- 6.31सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः |
- 6.32आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन |
- 6.33अर्जुन उवाच |
- 6.34चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् |
- 6.35श्रीभगवानुवाच |
- 6.36असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः |
- 6.37अर्जुन उवाच |
- 6.38कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति |
- 6.39एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः |
- 6.40श्रीभगवानुवाच |
- 6.41प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः |
- 6.42अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् |
- 6.43तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् |
- 6.44पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः |
- 6.45प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः |
- 6.46तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः |
- 6.47योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना |
- 6.48ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
FAQ· सामान्य प्रश्न
How many verses are in Bhagavad Gita Chapter 6?
Chapter 6 (Dhyana Yoga) of the Bhagavad Gita has 47 verses.
What is Bhagavad Gita Chapter 6 about?
This chapter explains how a person can train the mind to become calm, focused, and free from inner disturbance. It says that real progress comes when we control our habits, live with balance, and keep the mind from running after too many desires. The chapter also describes meditation as sitting quietly, focusing the mind, and slowly building a deep inner connection with the Divine. It teaches that even if the mind wanders, one should patiently bring it back again and again, because steady practice leads to peace.